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देख रही है जनता सबको, किसमें कितना पानी है !

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कौन है राजक, कौन अराजक, कौन यहाँ दुर्रानी है !
देख रही है जनता सबको, किसमें कितना पानी है !
.
देशभक्ति का नशा चढ़ाकर, झूम-झूम जय-जय बोलो !
नगर-गाँव, कस्बे-गलियों में, झूम-झूम जय-जय बोलो !
पक्ष-विपक्षी दोनों के आकाओं की, जय-जय बोलो !
अलख जगाने वाले इन नेताओं की, जय-जय बोलो !
.
धर्म-जाति भाषा के ठेकेदारों की, जय-जय बोलो !
आग लगा कर हाथ सेंकने वालों की, जय-जय बोलो !
देश बांटने वाला जो है, उसकी भी, जय-जय बोलो !
बापू का हत्यारा जो है, उसकी भी जय-जय बोलो !
.
खेतों में जो पैसे बोते हैं, उसकी जय-जय बोलो !
फिर घड़ियाली आंसू रोते हैं, उनकी जय-जय बोलो !
महंगाई को छोड़ चलो, मंदिर-मस्जिद की जय बोलो !
दो समाज को तोड़, चलो आरक्षण जी की जय बोलो !
.
होड़ लगी है, धूम मची है, इंद्रप्रस्थ के महलों में !
जो जितना ही जहर निकाले, वह उतना ही ज्ञानी है !
आपस में ही ताल ठोक, नूरा-कुश्ती लड़ने वालों !
देख रही है जनता सबको, किस्में कितना पानी है !
.
कौन है राजक, कौन अराजक, कौन यहाँ दुर्रानी है !
देख रही है जनता सबको, किसमें कितना पानी है !

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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
April 7, 2016

अत्यंत श्रेष्ठ कविता है यह आपकी शशिभूषण जी । जवाहर जी की टिप्पणी पर आपके उत्तर से ज्ञात हुआ कि आप एक पुस्तक के सृजन में संलग्न हैं । वह पुस्तक निस्संदेह उत्कृष्ट होगी जो आपकी लेखनी से उद्भूत होगी । हार्दिक शुभकामनाएं ।

Rajesh Dubey के द्वारा
April 6, 2016

नमस्कार भाई, बहुत दिनों के बाद आपकी कविता पढ़ने को मिल रही है. बहुत सुन्दर, इसी तरह से हम लोगों को अपनी कविता से जोड़े रखिये.

jlsingh के द्वारा
April 4, 2016

बहुत दिनों के बाद हे कविवर आपने भृकुटी तानी है, देख रहे हैं घर आँगन को छाई बहुत वीरानी है… कुशवाहा जी नहीं झांकते शाही जी मुंह मोड़ लिए, राजकमल जी कब के अपने प्यारे घर को छोड़ गए आदरणीय शशि भूषण सर जी, आपकी कविता पढ़ के आँख में आयी पानी है और कितना क्या कहूं. आप अगर बहुत ब्यस्त नहीं हैं तो बीच बीच में दर्शन दे दिया करें, सादर!

shashi bhushan के द्वारा
April 6, 2016

आदरणीय जवाहर भाई, सादर ! ब्लॉग पर सतत बने रहने की लालसा मन में हमेशा रहती है, परन्तु एक तो जागरण जंक्शन खुलने में बहुत देर करता है, ऊपर से जो भी रचना पढ़ना चाहता हूँ, उसका केवल हैडिंग दिखाता है, रचना खुलती ही नहीं ! मैं अपनी रचना भी नहीं देख-पढ़ पाता हूँ ! और कुछ व्यस्तता अपनी एक पुस्तक रचना को ले कर है ! अभी तो मैं उससे सम्बंधित पुस्तकें ही पढ़ रहा हूँ और नेट आदि से जानकारियां जुटा रहा हूँ ! इन्हीं सब कारणों से आप सब मित्रों-शुभचिंतकों से दूरी बनी हुई है !

shashi bhushan के द्वारा
April 9, 2016

आदरणीय जीतेंद्र जी, सादर ! रचना पर आपकी प्रतिक्रिया और शुभ कामना के लिए हार्दिक आभार !

shashi bhushan के द्वारा
April 9, 2016

आदरणीय राजेश जी, सादर ! इंटरनेट की दुर्बलता के कारण निरन्तर उपस्थिति में बहुत बाधा हो रही है ! प्रतिक्रिया के लिए सादर आभार !


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