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चिड़िया चुग गई खेत समूची, भैंस जा गिरी पानी में !

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खाट खड़ी, बिस्तरा गोल, हो गया आज श्रीमानों का !
जो कल तक जयकार किया करते थे बेईमानों का !
पद की गरिमा भूल – भालकर, डूबे थे नादानी में !
चिड़िया चुग गई खेत समूची, भैंस जा गिरी पानी में !
.
ताल ठोंक कर आज कह रहे, भ्रष्टाचार मिटायेंगे !
झूठे वादों से, भाषण से, भारत नया बनायेंगे !
लूट-खसोट और चोरी में, कहीं न जिनका सानी है !
दरबारी, युवराज और रानी की यहीं कहानी है !
.
रक्त पी गये, मांस खा गये, भारत को कंगाल कर दिया !
पंख नोंचकर सोने की चिड़िया का कैसा हाल कर दिया !
दिखलाते ऐसा जैसे यह हुआ सिर्फ बेध्यानी में !
चिड़िया चुग गई खेत समूची, भैंस जा गिरी पानी में !
.
चेहरा बदल-बदल कर बहुरुपिया नाटक है दिखा रहा !
“झूठे को सच्चा कह दो” यह जनता को है सिखा रहा !
मनसूबे काले, चेहरा काला, दिल में भी कालिख है !
खुद को ऐसे दिखलाता जैसे जनता का मालिक है !
.
सोने की थाली में, चाँदी के चम्मच से खाता है !
कभी नहीं रक्खा जिसने जनता से अपना नाता है !
“ट्विस्ट” बड़ा आनेवाला है, इनकी रामकहानी में !
चिड़िया चुग गई खेत समूची, भैंस जा गिरी पानी में !
.
धर्म-जाति-भाषा और मजहब में जनता को बाँट दिया !
क्षत-विक्षत कर दिया, देश को टुकड़े-टुकड़े काट दिया !
वादे का झुनझुना थमाकर, सदियों तुमने राज किया !
बड़े प्रेम से धीरे – धीरे, “भारत” को बरबाद किया !
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आज उसी बर्बादी का परिणाम भोगने वाले हो !
महलों से उठकर सीधे कारा में जानेवाले हो !
बह जायेगी नाव आज जनता की तेज रवानी में !
चिड़िया चुग गई खेत समूची, भैंस जा गिरी पानी में !

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
December 28, 2013

एक करोड़ दिल्ली की जनता ने झाड़ू सम्भाली है, ठोक-पीटकर अपने घर में नई चेतना पाली है, दिल्ली से ही देश देखता भारत के अभिमान को, सोने की चिड़िया का सपना आई नयी जवानी में चिड़ियाँ बैठी मौज से देखो दिल्ली की रजधानी में. सादर महोदय! कुछ नई पंक्तियाँ जोड़ने की कोशिश की है!


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