angaare

Just another weblog

18 Posts

320 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 14369 postid : 676118

फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे

  • SocialTwist Tell-a-Friend

नियति ने चली चाल इतनी भयानक,

जो ढीले थे फंदे, कसे जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !
.
चढ़ा था नशा जो मिला था सिंहासन,
न सोचा था ऐसे भँवर में पड़ेंगे !
बपौती समझ, कुर्सियों से थे चिपके,
न सोचा था इतनी बेशर्मी करेंगे !!
.
बिना डोर कि बन गए हैं तिलंगी,
दिशाहीन होकर उड़े जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !
.
युवराज, रानी सहित सारे नायक,
के चेहरे की कालिख चमकने लगी है !
जो जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझते
थे, कुर्सी उन्हीं की सरकने लगी है !!
.
न आती इन्हें शर्म अपने किये पर,
गज़ब बेहया हैं, हँसे जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !
.
भरी इनकी हाँड़ी, किये पाप इतने,
लबालब हुआ, अब छलकने लगा है !
नहीं खेल पाएंगे आपस में मिलकर,
मुखौटा सभी का उतरने लगा है !
.
जनता ने अपनी हिलाई जो चुटकी,
तो खटमल के जैसे पिसे जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !
.
दिखा आँकड़ों की चमकती सियाही,
किया करते थे ये सभी झूठे वादे !
न नीयत कभी साफ़ इनकी रही थी,
न इनके कभी साफ़ वादे – इरादे !
.
अब आई है बारी तड़पने की इनकी,
जो खुद से ही खुद को डँसे जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (2 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

8 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
December 29, 2013

भूषण जी, सादर नमन! बढ़िया कविता सुन्दर शंब्द “फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे, निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं!”

December 29, 2013

बहुत बढिया आदरणीय सुन्दर अभिव्यक्ति

abhishek shukla के द्वारा
December 28, 2013

बधाई हो सर! बेहतरीन, कुछ शब्द मेरी तरफ से… कितना जर्जर ये लोकतँत्र है, इससे तो तानाशाही अच्छी, केवल हम दँश झेलते हैँ, सरकार यहाँ है नरभक्षी.

yamunapathak के द्वारा
December 28, 2013

आदरणीय शशिभूषण जी नमस्कार बहुत दिनों बाद आपकी कविता मिली.बहुत अच्छी भावाभिव्यक्ति सदा की तरह साभार

jlsingh के द्वारा
December 27, 2013

और आज के दैनिक जागरण में भी कीचड में गदहे छपे नजर आ रहे थे आदरणीय शशिभूषण जी!

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
December 27, 2013

कथ्य और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ कवितात्मक प्रस्तुति ! आदरणीय बड़े भाई ! सादर बधाई !!

yogi sarswat के द्वारा
December 27, 2013

बिना डोर कि बन गए हैं तिलंगी, दिशाहीन होकर उड़े जा रहे हैं ! फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे, निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं ! . युवराज, रानी सहित सारे नायक, के चेहरे की कालिख चमकने लगी है ! जो जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझते थे, कुर्सी उन्हीं की सरकने लगी है !! . न आती इन्हें शर्म अपने किये पर, गज़ब बेहया हैं, हँसे जा रहे हैं ! फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे, निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं ! बहुत दिनों बाद फिर से धांसू शब्द पढ़ने को मिले आदरणीय श्री शशि भूषण जी ! बहुत बढ़िया

jlsingh के द्वारा
December 26, 2013

जनता ने अपनी हिलाई जो चुटकी, तो खटमल के जैसे पिसे जा रहे हैं ! फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे, निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं ! जनता को चुटकी ही नहीं बजानी है अब उसे दोनों हाथों से ताली बजानी है झाड़ू लगानी है जय हो आदरणीय शशिभूषण जी!


topic of the week



latest from jagran