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shashi bhushan


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चोरों की बारात , एक से एक धुरन्धर

Posted On: 3 Oct, 2013  
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पलकें बिछा तिहाड़ कर रहा, स्वागत की तैयारी है !!

Posted On: 1 Oct, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

इनके मित्र बने अपराधी, डाकू-चोर-लुटेरे ! नेता मंत्री व्यभिचारी ही इनको रहते घेरे ! घृणा भरी ऐसी कुरूप छवि इन्हें मिटाना होगा ! क्रूर भेड़ियों से अपना घर स्वयं बचाना होगा !! . इनके ही संरक्षण में अपराध सभी होते हैं ! इज्जत लुट जाती ये थाने में सोते रहते हैं ! कोंच-कोंच आँखों में ऊंगली, इन्हें जगाना होगा ! क्रूर भेड़ियों से अपना घर स्वयं बचाना होगा !! .कभी कभी लगता है आदरणीय श्री शशि भूषण जी की कलयुग आ गया है , शायद शुरुआत हो गयी है कलयुग की ! ये बात सही है की जब तक हम नहीं उठेंगे , नहीं जागेंगे तब तक ये होगा , होगा ही नहीं बढ़ता जाएगा ! इसलिए अब शाश्त्र उठा लेना ही शायद एक मात्र रास्ता बचता दीख रहा है ! जोशीले शब्दों में उर्जा भारती रचना !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा:

किस कारन खून बहते हो, वह लिख कर हमको बतलाना ! जब बड़े बनेंगे हम आकर, वह चीज हमीं से ले जाना ! हीरा-मोती, सोना-चांदी, जो भी चाहोगे दे देंगे ! पर आज खेलने-पढ़ने दो, उस दिन जो चाहो ले देंगे ! . इतनी सी विनती है अंकल, आशा है इसे मान लोगे ! वह हंसी हमारे अधरों की, लौटेगी अगर ध्यान दोगे ! हम तुमसे कुट्टी कर लेंगे, जो बात नहीं मानी सुन लो ! अथवा जीने दो ख़ुशी-ख़ुशी, दो में से एक तुम्ही चुन लो ! . यह भी स्वीकार नहीं हो तो, थोड़े दिन और ठहर जाओ ! कुछ और बड़े हो जाएँ हम, फिर खेल मृत्यु का दिखलाओ ! हम आज अनल के कण छोटे, कल ध्वजा हमारी फहरेगी ! तुम लहू बहाने वालों पर, विकराल काल बन घहरेगी ! . जो खींच रहे तम का परदा, रख देंगे उसे चीर कर हम ! मत समझो बिलकुल भोले हैं, मन से निकल दो तुम यह भ्रम ! देना जवाब चिट्ठी का तुम, अब पत्र बंद हम करते हैं ! बिन पढ़े फ़ेंक मत दो इससे, ज्यादा लिखने से डरते हैं...................बहुत खूब पिता श्री.....................एक दीये की रुफान से टकराने जैसे रचना...................हाथों में मशाल लेने को प्रेरित कराती है....................हार्दिक आभार!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय शशिभूषण जी, आपने ‘आतंकवादी अंकल को चिट्ठी’ के माध्यम से देश की छाती पर साँप की तरह लोटते मुसीबत को बाल-चेतना की मनुहार-फटकार के रूप बड़े ही सशक्त ढंग से व्यक्त किया है | कभी-कभी शारीरिक-गठन, स्वभाव आदि के आधार पर कुछ लोगों के चर्चित संबोधन व्यवहार में चल पड़ते हैं-– जैसे ‘लम्मू चाचा’, ‘नन्हकू मामा’, ‘गबगब भैया’ वगैरा | जाहिर है आज-कल करतूत के कारण देश के बच्चों की जुबान पर ‘नेहरु चाचा’ नहीं, बल्कि ‘आतंकवादी अंकल’ अधिक हैं | काश ! इस बाल वेदना-संवेदना, नन्हे बोध की प्रतिक्रिया पर आज के सबसे कुविख्यात अंकल जी भी ज़रा-सा गौर करते, थोड़ा-बहुत पिघलते-पसीजते | देश के सबसे बड़े दर्द को बाल-ह्रदय से बहते भाव-सन्देश को इतने गीले स्वरों में व्यक्त करने के लिए सहृदय साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ‘बेस्ट ब्लागर ऑफ द वीक’ के लिए’ हार्दिक बधाई !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

इतनी सी विनती है अंकल, आशा है इसे मान लोगे ! वह हंसी हमारे अधरों की, लौटेगी अगर ध्यान दोगे ! हम तुमसे कुट्टी कर लेंगे, जो बात नहीं मानी सुन लो ! अथवा जीने दो ख़ुशी-ख़ुशी, दो में से एक तुम्ही चुन लो ! . यह भी स्वीकार नहीं हो तो, थोड़े दिन और ठहर जाओ ! कुछ और बड़े हो जाएँ हम, फिर खेल मृत्यु का दिखलाओ ! हम आज अनल के कण छोटे, कल ध्वजा हमारी फहरेगी ! तुम लहू बहाने वालों पर, विकराल काल बन घहरेगी ! प्रिय शशि भाई ..नायाब रचना ..काश ये भोले मन के अबोध शिशुओं की बात सुन इनके बहरे कान खुल सकते .दिग्भ्रमित ये पथ पर लौट आते ..ये भी अपने घर के बच्चों का मुख देखते समझते उनके नैनों में झांकते और भी लोगों को अपनों सा समझते मानवता दानवता में फर्क कर सकते तो आनंद और आता ..काश ... बधाई हो इस यादगार और ख़ूबसूरत रचना के लिए औरबेस्ट ब्लॉगर आफ द वीक के लिए बधाई.. माँ सरस्वती की ये कृपा यों ही चमकती रहे आप पर .... आप की इजाजत मिलेगी तो इसे अपने निजी ब्लॉग पर भी डालेंगे ..... भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

यह भी स्वीकार नहीं हो तो, थोड़े दिन और ठहर जाओ ! कुछ और बड़े हो जाएँ हम, फिर खेल मृत्यु का दिखलाओ ! हम आज अनल के कण छोटे, कल ध्वजा हमारी फहरेगी ! तुम लहू बहाने वालों पर, विकराल काल बन घहरेगी ! .दिल फट पड़ता है ऐसी बातें , ऐसी विनती सुनकर ! सच कहा जाए तो माँ भी मजबूर है की बच्चों को घर में रखने को ! क्या से क्या हुआ इस मुल्क का ! मरने वाला न हिन्दू होता है और न मुसलमान ! वो बस होता है भारत माँ की संतान ! इसी आतंकवाद ने लोगों के दिल अलग अलग कर दिए ! क्या बात लिखी है साब , गज़ब ! मैं सलूट करना चाहता हूँ आपको भी और आपके शब्दों को भी ! बहुत बहुत बधाई ! जागरण वालों को भी बधाई की उन्होंने एक सार्थक और प्रभावित करने वाली रचना को उचित सम्मान दिया ! आपको बहुत बहुत बधाई आदरणीय श्री शशि भूषण जी ! आप तो मेरे फेवरिट ब्लॉगर हैं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

जलती मशाल दे हाथों में, जो कहते अपना घर फूंको ! अपने भ्राता के प्राण हतो, बहनों की इज्जत पर थूको ! होकर विवेक से शून्य, इशारे पर जिसके आगे बढ़ते ! वे अधम तुम्हारे क्या लगते, जो पाप तुम्हारे सिर मढ़ते ! . दिन याद करो जब तुम निकले होगे जननी का उदर फाड़ ! आँखों से आँखे मिला कहो, करती थी कितना तुम्हे लाड ! जिसके आँचल की छाया में, खेले-कूदे तुम बड़े हुए ! उसपर ही छुरी चलाओगे, क्या दिल के इतने कड़े हुए ! हमेशा की तरह सच को दिखाती , भावनाओं को जगाती रचना आदरणीय श्री शशि भूषण जी ! आपकी लेखनी में जादू है ! कहाँ से आया ? शायद कुछ मुझे भी मिल जाता ! लेकिन एक बात - आप को क्लिक करता हूँ तो आपके पेज पर कोई पोस्ट नही दिखती ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

माँ के नयनों का जल पोंछों, है यही तुम्हारा प्रायश्चित ! तुम संभलो तो फिर भारत का, होगा विकास यह है निश्चित !! होगा विकास है यह निश्चित! पर रोजी रोटी मिले नहीं फिर क्या लेकर ये खायेंगे. दूजे के धन को देख देख अपने को रोक न पाएंगे! माँ रोती, बहना रोती, भैया की आश में ही रहती! यह बड़ा हुआ धन लायेगा माँ अपनी बेटी से कहती! पढ़ लिखकर काबिल बना नौकरी मगर जब मिली नहीं. कातिल ने उसको फुसलाया लिप्सा भी उसकी मरी नहीं. दिग्भ्रमित युवा ऐसे होते, सरकारें जिसकी सुनी नहीं! आदरणीय कविश्रेष्ठ, सादर अभिवादन! अभी कल की ही बात है - दो पूर्व नक्सली अपने गाँव के स्कूली बच्चों को ट्रेन दिखलाने के लिए टाटानगर स्टेसन पर ले आए थे. इन बच्चों ने आजतक ट्रेन नहीं देखी थी, शहर नहीं देखा था ... यह है हमारा भारत ! फिर भर्र हम आपके आह्वान का स्वागत करते हैं!

के द्वारा: jlsingh jlsingh




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